क्या लिखु या फिर क्या करूँ, दिनोंदिन होनेवाली घटनाओं के परिप्रेक्ष्य में, दिल नहीं करता की कुछ लिखु, बहुत उदास, गुमसुम सा हो गया है ये मन। अपने आप से नाराज रहने लगा है, सामाजिक तानाबाना ऐसा बुना है इस देश के रहनुमाओं ने की घुटन सी होने लगी है।
प्रत्येक दिन सोचता हूँ कि कुछ ऐसा कर जाऊँ या फिर कुछ ऐसा हो जाये कि सारी तकलीफों, परेशानियों से छुटकारा मिले। हिन्दू होने पर जितना गौरवांवित महसूस करता हूँ, वहीं दूसरी ओर सेक्यूलर हिन्दुओं को देखकर मन क्षोभ और घृणा से भर जाता है।
कितनी विडंबना है इस सनातन धर्म की जो "सर्वधर्म समभाव" की भावना रखता है, बदले में क्या मिलता है "धोखा", "जिल्लत"। क्या सर्वधर्म समभाव की सजा मिल रही है सनातन धर्म को। क्यों आज अपने ही देश में कुंठित और पराया हो गया है इस देश का मूल निवासी?
वैश्विक संसार में सबको अपने भविष्य की चिन्ता है, और होनी भी चाहिये, लेकिन अपने स्वाभिमान को दाव पर लगा कर, क्यों भूल जातें हैं हम अपने उन महान शूरवीरों को जिन्होने इस सनातन धर्म की रक्षा हेतु अपने प्राण न्योछावर करना उचित समझा, बसर्ते किसी और संप्रदाय के सम्मुख सर झूकाने के।
बहुत कष्ट होता है, लेकिन साथ ही साथ ऊर्जा का संचार भी होता है कि एक दिन हम भी अपने सनातन धर्म का लोहा पूरे विश्व को मनवा कर ही रहेंगे चाहे हमें भी नयोछावर क्यों ना होना पड़े।। आरम्भ हो गया है धर्मयुद्ध का, अब तो आहुतियाँ माँगेगी, आहुतियों से डरकर जो भागा उससे उसका भविष्य हमेशा हिसाब माँगेगा।।।।।
आरम्भ है प्रचंड, बोले मस्तकों के झुंड, आज ज़ंग की घडी की तुम गुहार दो,
आन बान शान, याकि जान का हो दान, आज एक धनुष के बाण पे उतार दो!
आरम्भ है प्रचंड, बोले मस्तकों के झुंड, आज ज़ंग की घडी की तुम गुहार दो,
आन बान शान, याकि जान का हो दान, आज एक धनुष के बाण पे उतार दो!
मन करे सो प्राण दे, जो मन करे सो प्राण ले, वही तो एक सर्वशक्तिमान है,
कृष्ण की पुकार है, ये भागवत का सार है कि युद्ध ही तो वीर का प्रमाण है,
कौरवों की भीड़ हो या पांडवों का नीड़ हो जो लड़ सका है वो ही तो महान है!
जीत की हवस नहीं, किसी पे कोई वश नहीं, क्या ज़िन्दगी है, ठोकरों पे वार दो,
मौत अंत है नहीं, तो मौत से भी क्यों डरें, ये जाके आसमान में दहाड़ दो!
आरम्भ है प्रचंड, बोले मस्तकों के झुंड, आज ज़ंग की घडी की तुम गुहार दो,
आन बान शान, याकि जान का हो दान, आज एक धनुष के बाण पे उतार दो!
वो दया का भाव, याकि शौर्य का चुनाव, याकि हार का ये घाव तुम ये सोच लो,
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